
दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा ने यूनिवर्सिटी से मांग की है कि उन्हें नौकरी वापस दी जाए और इतने साल जो वे नौकरी से दूर रहे, उसका मुआवजा दिया जाए। साईबाबा को नक्सलियों से कथित संबंध रखने के शक में 2014 में गिरफ्तार किया गया था। गढ़चिरौली के सेशन कोर्ट ने मार्च 2017 में साईबाबा और अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया था।
5 मार्च को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने साईबाबा और 5 अन्य आरोपियों- हेम मिश्रा, महेश तिर्की, विजय तिर्की, नारायण सांगलीकर, प्रशांत राही और पांडु नरोटे को बरी कर दिया। कोर्ट ने उनकी उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है। उन्हें दोषसिद्धि के खिलाफ अपील करने की इजाजत भी दी गई है। एक आरोपी नरोटे की पहले ही मौत हो चुकी है।
2021 में कॉलेज ने प्रोफेसर पद से हटा दिया था
रिहाई के बाद नागपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साईबाबा ने कहा कि वे पढ़ाए बिना नहीं रह सकते हैं और प्रोफेसर के तौर पर अपनी नौकरी फिर से जॉइन करना चाहते हैं। दरअसल, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र हेम मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद नक्सलियों से संबंध मामले में साईबाबा का नाम भी सामने आया था।
हेम का दावा था कि वे छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के जंगलों में छिपे हुए नक्सलियों और प्रोफेसर के बीच एक कूरियर के रूप में काम कर रहे थे। साईबाबा की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के राम लाल आनंद कॉलेज ने उन्हें 2021 में अंग्रेजी के प्रोफेसर के पद से हटा दिया था।
मां के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाने का अफसोस
साईबाबा ने कहा कि मेरा परिवार सिर्फ उम्मीद पर जिंदा था। मुझे इस बात का अफसोस है कि मैं अपनी मां से उनके आखिरी समय में नहीं मिल पाया। मुझे उनकी अंतिम संस्कार की रस्में भी पूरी करने की इजाजत नहीं दी गई। मुझे आतंकवादी कहा गया, मेरे परिवार पर लांछन लगाया गया।
साईबाबा ने कहा कि जेल में उन्हें बहुत छोटी सी जगह में रहने को मजबूर होना पड़ा। जेल में 1500 लोगों की जगह में 3000 लोगों को रखा गया था। वहां सोने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं थी। बिना व्हीलचेयर के मुझे टॉयलेट जाने, नहाने यहां तक कि अपने लिए पानी का एक गिलास भी लाने में परेशानी होती थी।
जेल में दवाएं और मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं दिया गया
साईबाबा ने कहा कि मेरी खराब तबीयत के लिए डॉक्टर जो दवाएं और उपचार लिखकर देते थे, वो मुझे नहीं दिया जाता था। मैं आज आपके सामने जिंदा हूं पर मेरे शरीर का हर हिस्सा फेल हो रहा है। मुझे जेल के अंदर कई मेडिकल इमरजेंसी हुईं, पर उन्होंने मुझे सिर्फ पेनकिलर्स दिए और कुछ टेस्ट कराए। मैं अब तक मान नहीं पा रहा हूं कि मैं आजाद हो गया हूं। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं अब तक उसी जेल में हूं। वहां रहना मेरे लिए अग्नि परीक्षा जैसा था। मुझे एक परीक्षा देने के लिए दो बार अग्नि से गुजरना पड़ा।
माओवाद से कनेक्शन के आरोप में गिरफ्तारी
2013 में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में पुलिस ने माओवाद से जुड़े महेश तिर्की, पी. नरोटे और हेम मिश्रा को गिरफ्तार किया। इन्हीं तीनों से पूछताछ में जीएन साईबाबा का नाम आया, जिसके बाद पुलिस उनके खिलाफ कोर्ट गई। माओवाद से कनेक्शन के आरोप में 9 मई 2014 को दिल्ली आवास से साईबाबा को गिरफ्तार किया गया। 2015 में साईबाबा के खिलाफ UAPA के तहत केस दर्ज कर कार्यवाही शुरू की गई।
2017 में गढ़चिरौली कोर्ट ने दोषी पाया था
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली कोर्ट ने 2017 में साईबाबा और पांच अन्य को आरोपियों को UAPA और भारतीय दंड संहिता के तहत दोषी ठहराया। साईबाबा और चार अन्य को आजीवन कारावास की सजा और एक को दस साल की कैद की सजा सुनाई गई थी। गढ़चिरौली कोर्ट के फैसले के खिलाफ साईबाबा ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की।
अक्टूबर 2022 में भी हाईकोर्ट ने बरी किया था
14 अक्टूबर 2022 को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने साईबाबा को बरी कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि तुरंत साईबाबा को जेल से रिहा कर दिया जाए। हाईकोर्ट से जीएन साईबाबा के बरी होने के बाद महाराष्ट्र सरकार की ओर से तुषार मेहता जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच में गए।
मेहता ने कहा- टेक्निकल आधार पर साईबाबा को रिहा किया गया है। वे अगर जेल से बाहर आते हैं तो देश के लिए ये खतरनाक होगा। साईबाबा का माओवादियों से कनेक्शन है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अर्जेंट सुनवाई के लिए आप चीफ जस्टिस के पास जाइए, हम रिहाई पर रोक नहीं लगा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साईबाबा की रिहाई पर रोक लगाई
सुप्रीम कोर्ट ने अगले ही दिन 15 अक्टूबर को साईबाबा को बॉम्बे हाईकोर्ट से बरी किए जाने के फैसले पर रोक लगा दी थी। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की बेंच ने कहा था कि मामले में विस्तृत सुनवाई की जरूरत है, इसलिए अभी साईबाबा जेल से बाहर नहीं निकल पाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान साईबाबा की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट आर बसंत ने कहा था कि पूर्व प्रोफेसर 8 साल से जेल में बंद हैं। उनकी उम्र 55 साल है और उनके शरीर का 90% हिस्सा काम नहीं करता है। साईबाबा व्हीलचेयर पर चलते हैं, इसलिए उन्हें जेल में अब न रखा जाए। इस पर कोर्ट ने कहा था कि आतंकी और नक्सली गतिविधि में शामिल होने के लिए शरीर की नहीं ब्रेन की जरूरत होती है।