नई दिल्ली: समंदर में हलचल बढ़ गई है। एक टैंकर जिसे पहले चीन जाना था, वह भारत की ओर सिग्नल देने लगा है। इस पर ईरानी कच्चा तेल लोड है। इसका नाम पिंग शुन है। अमेरिका ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा था। फारस की खाड़ी के अंदरूनी हिस्से से यह ईरानी कच्चा तेल ला रहा है। भारत के लिए यह लगभग सात सालों में इस तरह का पहला आयात हो सकता है। बशर्ते यह किसी और दिशा में नहीं घूमता है। पिंग शुन चीन जाता रहा है। लेकिन, अब तक इसने भारत में कभी डिलीवरी नहीं की है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में इस बारे में जानकारी दी गई है।पिंग शुन 2002 में बना एक अफ्रामैक्स जहाज है। जिस पर 2025 में अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया था। इसने सोमवार को संकेत देना शुरू किया कि वह इस हफ्ते के आखिर में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित वडीनार बंदरगाह पर पहुंचेगा। जहाज-ट्रैकिंग डेटा से इसका पता चलता है।मार्च में लोड किया था तेल
केप्लर और वोर्टेक्सा जैसी जहाज-ट्रैकिंग फर्मों के अनुसार, इस टैंकर ने मार्च की शुरुआत में खर्ग द्वीप से कच्चा तेल लोड किया था। जहाज का डेस्टिनेशन अभी तय नहीं है। यह किसी भी समय बदल सकता है।इस जहाज से सफल डिलीवरी होने पर मई 2019 के बाद यह भारत की ईरान से कच्चे तेल की पहली खरीद होगी। मई 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने इस देश से तेल का आयात बंद कर दिया था।
क्यों महत्वपूर्ण है यात्रा का समय?
- यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत तेल की बढ़ती कीमतों से रूबरू है।
- ईरान युद्ध के कारण मिडिल ईस्ट में ईंधन की सप्लाई बाधित हुई है।
- इसके चलते समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद हो गया है।
अमेरिका ने दी है छूट
पिछले महीने अमेरिका ने बाजार को राहत देने की कोशिश करते हुए उन ईरानी कच्चे तेल पर अपने प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी थी जो पहले से ही टैंकरों में लोड हो चुका था। भारत के सरकारी खरीदारों ने अब तक ऐसी खरीद से परहेज किया है। कारण है कि भुगतान, शिपिंग और बीमा से जुड़ी बाधाएं संभावित सौदों को मुश्किल बना देती हैं।पिंग शुन का वडीनार जाने का संकेत खुले तौर पर देना इस बात का संकेत हो सकता है कि खरीदार उन बाधाओं को दूर करने के करीब पहुंच गए हैं।अभी भी कई पेच हैं मौजूद
हालांकि, ऐसे मुद्दे अभी भी चुनौतियां पेश कर सकते हैं। जैसा कि हाल ही में भारत को ईरानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की बिक्री के मामले में देखा गया था। इस मामले से परिचित लोगों ने यह जानकारी दी।'सी बर्ड' नाम का एक जहाज 30 मार्च को मैंगलोर पहुंचा था। लेकिन, उसने अभी तक अपना माल नहीं उतारा है। बंदरगाह एजेंट की रिपोर्ट के अनुसार, रिसीवर अभी डिलीवरी लेने के लिए तैयार नहीं है। इन लोगों ने बताया कि भुगतान से जुड़े मुद्दों को अभी भी सुलझाया जा रहा है।
मामले से परिचित लोगों के अनुसार, अस्थायी छूट मिलने के बावजूद एशिया भर में अमेरिकी डॉलर से होने वाले भुगतानों में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले कुछ बैंकों ने संकेत दिया है कि वे ईरानी कच्चे तेल के लेन-देन में मदद नहीं करेंगे। कारण है कि ऐसा करने पर उन्हें प्रतिबंधित ईरानी संस्थाओं के साथ काम करना पड़ेगा, जो अभी भी मना है।
टैंकर की भारत में होगी पहली डिलीवरी
इस हफ्ते अपना डेस्टिनेशन बदलकर वडीनार करने से पहले टैंकर ने संकेत दिया था कि वह चीन जा रहा है, जहां वह पहले भी कई बार जा चुका है। पिंग शुन की भारत में यह पहली ज्ञात डिलीवरी होगी।इक्वेसिस डेटाबेस के अनुसार, जहाज की चीन स्थित प्रबंधक कंपनी 'नाइसिटी शिपमैनेजमेंट' ने इस पर तुरंत जवाब नहीं दिया। इसकी मालिक कंपनी ब्लू वेनिस शिपिंग इंक. के संपर्क विवरण भी नाइसिटी जैसे ही हैं।भारत की सरकारी रिफाइनरी कंपनियां वडीनार बंदरगाह पर अपने तेल के कार्गो प्राप्त करती हैं। इनमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और रोसनेफ्ट समर्थित नायरा एनर्जी लिमिटेड शामिल हैं। इस महीने नायरा रखरखाव के लिए अपने प्लांट को एक महीने के लिए बंद कर देगी। इससे उसे कच्चे तेल के आयात की जरूरत नहीं रहेगी।
इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और नायरा ने ब्लूमबर्ग के भेजे गए ईमेल का तुरंत जवाब नहीं दिया है।