चांदी के रथ में नगर भ्रामण पर निकली भगवान आदिनाथ की शोभा यात्रा

Updated on 03-04-2024 05:33 PM

रायपुर। आदिनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर मालवीय रोड में प्रथम तीर्थंकर मूलनायक आदिनाथ भगवान का जन्म महोत्सव बड़े ही धूम धाम से भक्तिमय वातावरण में मनाया गया। ट्रस्ट कमेटी के अध्यक्ष संजय जैन नायक एवं सचिव राजेश रज्जन जैन ने बताया की चतुर्थ कालीन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर देवाधिदेव आदिनाथ भगवान की जयंती 3 अप्रैल को चैत्र कृष्ण नवमी को मनाई गई।

आज इस अवसर पर सुबह 7.30 बजे एक शोभा यात्रा निकाली गई जिसमे सर्वप्रथम चांदी के रथ में भगवान आदिनाथ को विराजमान कर धार्मिक धुनों पर बाजे गाजे के साथ नगर भ्रमण करवाया गया। रथ में सारथी बनने का सौभाग्य राकेश कुमार जैन एवं सुजीत जैन को प्राप्त हुआ। आज पुरुष वर्ग पारंपरिक परिधान कुर्ता पैजामा में एवं महिलाए केसरिया साड़ी में उपस्थित थी। यह शोभा यात्रा राजधानी रायपुर के मालवीय रोड स्थित बड़ा मंदिर से कोतवाली चौक, सदर बाजार एडवर्ड रोड, गोल बाजार, चिकनी मंदिर होते हुए वापस मालवीय रोड स्थित बड़े मंदिर पहुंची जहा संजय पंडित के दिशा निर्देश में प्रमुख चार इंद्र द्वारा भगवान आदिनाथ को पाण्डुकशिला में विराजमान कर स्वर्ण कलशो में प्रासुक जल भर कर प्रथम अभिषेक किया गया। प्रमुख चार इंद्र बनने का सौभायग्य महेंद्र कुमार सनत कुमार जैन चूड़ी वाला परिवार,आनंद जैन पूर्वा ग्राफिक्स ललिता चौक,प्रभात जैन अर्जुन एनक्लेव,सुनील जैन कचहरी चौक वालो को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात भगवान की रिद्धि सिद्धि  सुख शांति चमत्कारिक वृहद शांति धारा की गई जिसे करने का सौभाग्य चंद्रकांत जैन लोकेश जैन बढ़ईपारा एवं महेंद्र कुमार सनत कुमार जैन चूड़ी वाला परिवार को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात देव शास्त्र गुरु पूजन कर भगवान की निर्वाण कल्याणक पूजन कर विसर्जन पाठ कर महा अर्घ्य चढ़ाया गया। अंत में महाआरती की गई। इस अवसर पर ट्रस्ट एवं कार्यकारिणी कमेटी महिला मंडल के सदस्यो के साथ साथ बड़ी संख्या में धर्म प्रेमी बंधु उपस्थित थे।

प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के जीवन के प्रमुख अंश...
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का जन्म उत्तरप्रदेश के अयोध्या नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा नाभि राय और माता का नाम रानी मरू देवी था। आदिनाथ भगवान का जन्म आज से 84 लाख वर्ष पूर्व हुआ था। आदिनाथ भगवान की लंबाई 500 धनुष थी लगभग 15 सौ मीटर। राजा ऋषभ देव के भरत चक्रवर्ती और बाहुबली आदि सौ पुत्र हुए और ब्राह्मी एवं सुंदरी नाम की दो बेटियां थी । राज दरबार लगा हुआ था नीलांजना का नृत्य दरबार में चल रहा था सभी राजा महाराजा विराजमान थे नृत्य करते-करते नीलांजना की मृत्यु हो जाती है। उसी समय राजा ऋषभदेव को वैराग्य आ जाता है और अपना संपूर्ण राज पाठ अपने दोनों बेटों भरत एवं बाहुबली को सौंप कर वन को चले जाते हैं। 6 महीने तक घोर तपस्या करते हैं और उन्हें 6 महीने तक आहार की विधि नहीं मिलती है। 1 वर्ष बाद अक्षय तृतीया के दिन उनके आहार होते हैं। राजा श्रेयांश के यहां गन्ने की रस के द्वारा आदिनाथ मुनि राज के आहार होते हैं। जब भगवान की आयु 14 दिन शेष रहती है वह कैलाश पर्वत पर जाकर माघ कृष्ण चतुर्दशी को आदिनाथ भगवान कैलाश पर्वत वर्तमान में उत्तराखंड से मोक्ष चले जाते हैं । वह संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। आदिनाथ भगवान ही जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर एवं जैन धर्म के प्रवर्तक माने जाते हैं। आदिनाथ भगवान को ऋषभ देव भी कहा जाता है।

भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया था।अब तक अनंत तीर्थंकर हो चुके हैं। एक काल में 24 तीर्थंकर ही होते हैं। इस काल के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान हैं। काल दो प्रकार के होते हैं। एक उत्सर्पिणी और दूसरा अवसर्पिणी। जो काल उत्थान से पतन की और जाता है वह अवसर्पिणी काल है। जो पतन से उत्थान की और जाए वह उत्सर्पिणी काल है, तो मौजूदा काल अवसर्पिणी काल है और इस काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ हुए हैं।भगवान आदिनाथ के जन्म से पहले तक भोगभूमि की व्यवस्था थी। जब उन्होंने जगत को पुरुषार्थ का ज्ञान दिया तब से कर्मभूमि की व्यवस्था शुरू हुई। भोगभूमि में पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं होती। उनमें सब कुछ कल्पवृक्ष से मिलता है। लेकिन कर्मभूमि में मनुष्य को पुरुषार्थ कर जीविकोपार्जन के साधन स्वयं जुटाने पड़ते हैं। यह कैसे करना है, जीवन जीने के तरीके क्या होने चाहिए और समाज में रहने हुनर क्या है, यह सब भगवान आदिनाथ ने बताया।

उन्होंने परिवार को बढ़ाने के लिए विवाह पद्धति का वर्णन किया।भगवान आदिनाथ ने सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए नगर, गांव, मकान आदि बनाने और उन्हें बसाने का उपदेश दिया था। इसी के साथ उन्होंने वर्ण व्यवस्था का उपदेश भी दिया। उन्होंने वर्ण व्यवस्था की स्थापना प्रजा के कार्य के अनुसार की थी। जो लोग विपत्ति के समय मनुष्यों की रक्षा करने के नियुक्त किए गए थे, वे क्षत्रिय कहलाए। वाणिज्य, खेती, गोरक्षा आदि के व्यापार में जो लगे थे वे वैश्य कहलाए। जो निम्नस्तर का कार्य करते थे तथा धार्मिक शास्त्रों से दूर भागते थे, वे शूद्र कहलाए। इसके बाद भरत चक्रवर्ती ने पूजा, पाठ करने वाले और यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने वाले ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की। इस प्रकार से जैन धर्म में चार वर्ण की स्थापना उल्लेख मिलता है।

संस्कारों के बीजरूप का शंखनाद करते हुए आदिनाथ भगवान ने अपने पुत्र को अपने हाथों से जनेऊ संस्कार किया। जनेऊ संस्कार का मतलब होता था कि अब यह मद्य, मांस, मधु, बड़, पीपल, कटुम्बर, अंजीर, गूलर आदि का सेव नहीं करेगा। जनेऊ पहनने वाला ही जिनेन्द्र की पूजा, अभिषेक कर सकता है क्यों कि वह अष्टमूलगुणों का पालन करने वाला है।भगवान आदिनाथ ने असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प, विद्या जैसे छह कर्मों को आजीविका का साधन बताया। इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि इससे दूसरों के जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन हो। मनुष्य एक-दूसरे के जीवनयापन में सहयोगी बन कर सामाजिक व्यवस्थाओं में सहयोगी बनें। अजीविका का अर्जन करते समय भी धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रहे, इसके लिए छह आवश्यक कर्म देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, त्याग (दान) बताए, ताकि इनके माध्यम से मनुष्य धर्म ध्यान कर पुण्य का संचय कर सकें और जीवन में जो अशुभ कर्म का बन्ध किया है, उनका नाश कर सके
समाज में स्त्रीशिक्षा के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि लिखने का एवं सुन्दरी को इकाई, दहाई आदि अंक विद्या सिखाई। इसी प्रकार भगवान ने अपने भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्रों को सभी विद्याओं का अध्ययन कराया था। इसी तरह जीवन में कलाओं के महत्व को स्थापित करने के लिए भगवान आदिनाथ ने 72 कलाओं का उपदेश भी दिया है। तो इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य को भोगभूमि से कर्मभूमि में लाकर भगवान आदिनाथ ने पुरुषार्थ का उपदेश दिया और उस व्यवस्था का निर्माण किया जो आज तक चली आ रही है तथा जीविकोपार्जन के मूल सिद्धांतों में शामिल है।


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