
रिपोर्ट के मुताबिक, जिले में कुल 5,40,869 छात्र नामांकित हैं। इनमें से 2,22,265 छात्र सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ रहे हैं। जबकि 3,18,604 छात्र निजी स्कूलों में दर्ज हैं। यानी करीब 96 हजार से ज्यादा छात्र निजी स्कूलों में अधिक हैं।
राजधानी ब्लॉक में सबसे बड़ा अंतर
रायपुर शहरी ब्लॉक के आंकड़े सबसे ज्यादा चौंकाते हैं। यहां कुल 2,34,828 छात्र नामांकित हैं। इनमें से 1,73,825 छात्र निजी और मदरसा स्कूलों में पढ़े रहे हैं। जबकि सिर्फ 61,003 छात्र सरकारी और एडेड स्कूलों में हैं।
इसका मतलब राजधानी क्षेत्र में लगभग 10 में से 7 से 8 छात्र निजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। धरसींवा जैसे औद्योगिक और शहरी प्रभाव वाले ब्लॉक में भी निजी स्कूलों की संख्या सरकारी स्कूलों से ज्यादा है।
ब्लॉकवार स्थिति, कहां कौन आगे ?
सरकारी स्कूल अपेक्षाकृत मजबूत
निजी स्कूलों का दबदबा
यह ट्रेंड बताती है कि ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूल अब भी टिके हुए हैं। शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में निजी स्कूलों की पकड़ तेजी से मजबूत हुई है।
APAAR रिपोर्ट क्या है ?
APAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) केंद्र सरकार की “वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी” योजना है। इसके तहत हर छात्र को एक यूनिक डिजिटल आईडी मिलती है, जो आधार सत्यापन से जुड़ी रहती है।
नामांकन, आधार वैलिडेशन और आईडी जनरेशन का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल डैशबोर्ड पर दर्ज होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, रायपुर जिले में 95.11% छात्रों की APAAR आईडी बन चुकी है।
विशेषज्ञ की राय
शिक्षाविद जवाहर सुरी शेट्टी का कहना है कि निजी स्कूलों में बढ़ती संख्या के पीछे कई कारण हैं। उनके अनुसार, लोगों के मन में यह धारणा बन गई है कि शुरुआती स्तर से ही निजी स्कूलों में पढ़ाना बेहतर रहता है।
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, अधोसंरचना की दिक्कतें और बार-बार तबादले जैसी समस्याएं पढ़ाई को प्रभावित करती हैं। वहीं अभिभावकों को लगता है कि निजी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम, अनुशासन और प्रतिस्पर्धी माहौल बेहतर मिलता है।
आंकड़े क्या संकेत देते हैं ?
शहरी अभिभावकों का झुकाव तेजी से निजी स्कूलों की ओर बढ़ा है। अंग्रेजी माध्यम, बेहतर भवन और प्रतिस्पर्धी माहौल मुख्य कारण माने जा रहे हैं। सरकारी स्कूल डिजिटल सिस्टम में पीछे नहीं हैं, लेकिन नामांकन में गिरावट दिख रही है।
APAAR रिपोर्ट के आंकड़े साफ बताते हैं कि रायपुर में शिक्षा का संतुलन अब निजी स्कूलों की ओर झुक चुका है। अब चुनौती यह है कि सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता, सुविधाएं और भरोसा कैसे मजबूत किया जाए, ताकि नामांकन का अंतर कम हो सके।