पाकिस्तान के 80 फीसदी हथियार अब चीनी, ड्रैगन की गोद में बैठा पड़ोसी, SIPRI रिपोर्ट भारत के लिए क्‍यों है खास?

Updated on 09-03-2026 03:59 PM
इस्लामाबाद/बीजिंग: स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट से पता चला है कि पाकिस्तान अब अपने 80 फीसदी हथियार चीन से खरीदता है। SIPRI ने 2026 के लिए नई रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 2025 में दुनियाभर में हुए हथियार सौदों पर फोकस किया गया है। इस रिपोर्ट से पता चला है कि 2021–25 के बीच दुनिया के देशों के बीच बड़े हथियारों का ग्लोबल वॉल्यूम पिछले पांच साल के टाइमलाइन (2016–20) की तुलना में 9.2 प्रतिशत ज्यादा हुआ है। 2011-15 के मुकाबले ये सबसे बड़ी छलांग है।

SIPRI रिपोर्ट से पता चलता है कि पाकिस्तान अपनी परमाणु और पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को लगातार बढ़ा रहा है और सेना का आधुनिकीकरण जारी है। लेकिन सिप्री रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि यूरोपीय देश यूक्रेन युद्ध से डरे हुए हैं और उन्होंने हथियारों की खरीद में भारी बढ़ोतरी की है। 2011-15 के मुकाबले 2021–25 के बीच यूरोपीय देशों की हथियार खरीददारी में 210 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

चीनी हथियारों पर पूरी तरह से निर्भर हो चुका पाकिस्तान

  • चीन पर पूर्ण निर्भरता- SIPRI रिपोर्ट के मुताबिक 2021-2025 के बीच पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 80% हो गई है जो 2016-2020 में 73% थी। ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान अब आंख मूंदकर चीनी हथियार खरीदता है। वहीं इसका दूसरा मतलब ये भी है कि पाकिस्तान को कोई दूसरा देश हथियार दे भी नहीं रहा है।
  • हथियार खरीदने में पांचवें नंबर पर पाकिस्तान- 2016–20 की तुलना में 2021–25 के दौरान पाकिस्तान के हथियारों के आयात में 66% की बढ़ोतरी हुई है। पाकिस्तान अब दुनिया के उन शीर्ष 5 देशों में शामिल है जो सबसे ज्यादा हथियार खरीदते हैं जिनमें पहले चार जगहों पर यूक्रेन, भारत, सऊदी अरब और कतर हैं। चीन के बाद पाकिस्तान के मुख्य सप्लायर तुर्की (7.0%) और नीदरलैंड (4.6%) हैं।

पाकिस्तान चीन की जुगलबंदी, भारत के लिए क्या मतलब?

  • सैन्य संतुलन में बदलाव- चीन के हथियारों पर पाकिस्तान की हद से ज्यादा निर्भरता भारत के लिए खतरनाक है। पिछले साल मई संघर्ष में हम देख चुके हैं कि चीन पाकिस्तान को सैटेलाइट और सैन्य मदद दे रहा था। पाकिस्तान का चीनी हथियारों का खरीदना सिर्फ सैन्य सौदा नहीं है बल्कि भारत के लिए इसका मतलब दक्षिण एशिया के सैन्य संतुलन में बड़ा बदलाव है, जैसे पाकिस्तान चीनी जे-35 स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने के लिए बात कर रहा है।
  • टू फ्रंट वॉर का बढ़ा खतरा- पाकिस्तान के हथियारों की खरीद में 2021-25 के बीच 66% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसमें सबसे बड़ा हाथ चीन का है। इसका मतलब है कि युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान और चीन के हथियार प्रणालियां जैसे फाइटर जेट्स, मिसाइलें और रडार एक-दूसरे के साथ पूरी तरह तालमेल में काम करेंगे। भारत को अब एक साथ दो सीमाओं पर एक जैसी तकनीक वाले दुश्मनों से लड़ने की तैयारी रखनी होगी।
  • लंबी लड़ाई लड़ने में आसानी- पाकिस्तान की पूरी मिलिट्री लॉजिस्टक अब चीन पर निर्भर है। इसका मतलब है कि चीन और पाकिस्तान भारत को लेकर जो डेटा हासिल करेंगे उसे एक साथ अपने हथियार सिस्टम के साथ इंटीग्रेट कर सकते हैं। युद्ध के समय चीन आसानी से पाकिस्तान को हथियारों की सप्लाई जारी रख सकता है जिससे पाकिस्तान लंबी लड़ाई लड़ने में सक्षम हो जाएगा।
  • भारत के लिए कई फायदे- भारत के लिए सारी बातें नकारात्मक ही नहीं हैं बल्कि कई फायदे भी हैं। भारत को अपने दोनों दुश्मन चीन और पाकिस्तान के हथियारों को लेकर एक जैसी ही तैयारी करनी होगी। भारत अपने हथियारों में विविधता ला चुका है। भारत ने रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करके उसे 40% पर लाया है। जबकि फ्रांस से 29 प्रतिशत और इजरायल से 15 प्रतिशत हथियार खरीदने का मतलब ये है कि चीन पाकिस्तान को भारत के अलग अलग हथियारों को लेकर अलग अलग तैयारी करनी होगी।
रूस से 66 प्रतिशत हथियार खरीदता है रूस
वहीं साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने SIPRI रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया है कि हालांकि चीन के हथियारों की खरीददारी में 72 प्रतिशत की कमी आई है। लेकिन रूस अभी भी चीन का सबसे बड़ा हथियार का सोर्स है। रूस जितने हथियार खरीदता है उसका 66 प्रतिशत रूस से खरीदता है। बीजिंग तेजी से रूसी हार्डवेयर को हटाकर अपनी टेक्नोलॉजी जिसमें हेलीकॉप्टर और एयरक्राफ्ट इंजन शामिल हैं, उसका इस्तेमाल कर रहा है।
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